वैश्विक स्तर पर बढ़ता तनाव एक ऐतिहासिक मानसिक संकट की पूरी तस्वीर

21वीं सदी का दूसरा दशक मानव इतिहास के सबसे कठिन मानसिक दौर के रूप में दर्ज किया जा रहा है।
कोरोना महामारी के बाद दुनिया जिस रफ्तार से आगे बढ़ी, उसी रफ्तार से मानसिक तनाव, अवसाद और चिंता भी बढ़ते चले गए। विशेषज्ञों का मानना है कि वर्ष 2020 से 2025 के बीच का समय भविष्य में एक वैश्विक मानसिक संकट (Global Mental Health Crisis) के रूप में पढ़ाया जाएगा।महामारी ने न केवल स्वास्थ्य प्रणालियों को झकझोरा, बल्कि मानव मन की सहनशक्ति को भी गहराई से प्रभावित किया अनिश्चितता, डर, आर्थिक अस्थिरता और सामाजिक दूरी ने लोगों के मानसिक संतुलन को तोड़कर रख दिया।
तनाव अब व्यक्तिगत नहीं, सामाजिक महामारी बन चुका है
अब तनाव को किसी एक व्यक्ति की कमजोरी, असफलता यानकारात्मक सोच के रूप में नहीं देखा जा रहा।मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञों के अनुसार, तनाव आज समाज के हर वर्ग, हर उम्र और हर पेशे कोप्रभावित कर रहा है।काम का बढ़ता दबाव, रिश्तों में अस्थिरता और स्वास्थ्य से जुड़ी चिंताएँ—तीनों मोर्चों पर इंसान लगातार संघर्ष कर रहा है। पहले जहां तनाव सीमित परिस्थितियों तक रहता था, वहीं अब यह लगातार बनी रहने वाली स्थिति बन चुका है यही कारण है कि मानसिक तनाव अब सार्वजनिक स्वास्थ्य संकट का रूप ले चुका है, जिसे वैश्विक संस्थाएँ 21वीं सदी की सबसे गंभीर चुनौती मान रही हैं।सामाजिक विभाजन बना तनाव कारणAmericanPsychological Association (APA) की चर्चित Stress in America 2025 रिपोर्ट इस संकट की गहराई को स्पष्ट करती है।रिपोर्ट के अनुसार, 83 प्रतिशत लोगों ने स्वीकार किया कि सामाजिक विभाजन (Social Division) उनकी ज़िंदगी में तनाव का सबसे बड़ा कारण बन चुका है।राजनीतिक ध्रुवीकरण, धार्मिक-सामाजिक असहिष्णुता, आर्थिक असमानता और डिजिटल प्लेटफॉर्म पर बढ़ती कटु बहसों ने समाज को अंदर से बाँट दिया है।लोग भले ही तकनीक के ज़रिये जुड़े हुए दिखते हों,लेकिन मानसिक और भावनात्मक स्तर पर वे पहले से कहीं ज़्यादा दूर हो गए हैं।विशेषज्ञ इसे Connected but Isolated Society” का नाम दे रहे हैं
जहाँ संवाद तो है, लेकिन संवेदना नहीं।
तनाव अब शरीर पर भी सीधा असर डाल रहा है APA की रिपोर्ट यह भी स्पष्ट करती है कि मानसिक तनाव अब केवल दिमाग़ तक सीमित नहीं रहा।यह सीधे शरीर पर असर डाल रहा है और कई गंभीर शारीरिक बीमारियों का कारण बन रहा है।
तनाव से जुड़े आम शारीरिक लक्षणों में शामिल हैं
लगातार सिरदर्द,नींद न आना,हाई ब्लड प्रेशर,दिल की धड़कन का असामान्य रूप से तेज़ होना।चिकित्सकों के अनुसार, लंबे समय तक बना रहने वाला तनाव हार्ट डिज़ीज़, डायबिटीज़, पाचन संबंधी समस्याओं और इम्यून सिस्टम की कमजोरी का कारण बन सकता है।
यानी तनाव अब केवल “मन की परेशानी” नहीं,
बल्कि शरीर को नुकसान पहुँचाने वाली स्थिति बन चुका है।भीड़ में भी अकेलापन — नया मानसिक खतरा आज का इंसान परिवार, समाज और भीड़ के बीच रहते हुए भी अकेलापन (Loneliness) महसूस कर रहा है।यह अकेलापन आधुनिक युग की सबसे खामोश लेकिन घातक मानसिक समस्या बनता जा रहा है।
इतिहास पर नज़र डालें तो फर्क साफ़ दिखाई देता है।
पहले समाज सामूहिक था—लोग एक-दूसरे पर निर्भर थे।आज समाज व्यक्तिगत हो गया है—हर व्यक्ति अपनी लड़ाई अकेले लड़ रहा है।मनोवैज्ञानिक मानते हैं कि यही सामाजिक रिश्तों की टूटन तनाव, अवसाद और आत्महत्या जैसे खतरनाक विचारों को जन्म दे रही है।
बर्नआउट: युवाओं में तनाव का नया चेहरा
Study Finds की Burned-out Generation रिपोर्ट बताती है कि तनाव का सबसे खतरनाक असर अब युवाओं पर दिख रहा है।जहाँ पहले मानसिक थकान 40–50 वर्ष की उम्र में देखी जाती थी,वहीं अब 20–30 वर्ष के युवा ही बर्नआउट का शिकार हो रहे हैं।विशेषज्ञ इसे मानव इतिहास का बड़ा बदलाव मानते हैं, क्योंकि पहली बार युवा पीढ़ी सबसे ज़्यादा मानसिक दबाव में दिखाई दे रही है—वह पीढ़ी, जिससे समाज को भविष्य की सबसे अधिक उम्मीदें थीं।डिजिटल ज़िंदगी ने तनाव को 24×7 बना दिया युवाओं में बढ़ते बर्नआउट के पीछे डिजिटल जीवनशैली को एक बड़ा कारण माना जा रहा है।लगातार काम और परफॉर्मेंस का दबाव,मोबाइल और सोशल मीडिया से चौबीसों घंटे जुड़ाव,
और “हमेशा बेहतर बनना है”
मानसिक दौड़
इन सबने दिमाग़ को आराम करने का मौका ही नहीं दिया
विशेषज्ञ चेतावनी दे रहे हैं कि डिजिटल ओवरलोड आने वाले वर्षों में मानसिक स्वास्थ्य की सबसे बड़ी वजह बन सकता है।आर्थिक दबाव और नौकरी का डरतनाव बढ़ने की एक बड़ी वजह आर्थिक असुरक्षा भी है lnvestopedia की रिपोर्ट के अनुसार,48 प्रतिशत अमेरिकियों ने माना कि महंगाई, बढ़ता खर्च, कर्ज़ और नौकरी जाने का डर उन्हें लगातार तनाव में रखता है।पहले आर्थिक संकट अस्थायी हुआ करते थे—मंदी आती थी और चली जाती थी।लेकिन आज आर्थिक अनिश्चितता एक स्थायी डर बन चुकी है, जिसने लोगों की मानसिक शांति छीन ली है।मानसिक स्वास्थ्य अब वैश्विक आपातकालWorld Health Organization (WHO) के अनुसार,दुनिया भर में 1 अरब से अधिक लोग मानसिक स्वास्थ्य समस्याओं से जूझ रहे हैं।इनमें सबसे ज़्यादा मामले चिंता (Anxiety) और अवसाद (Depression) के हैं।WHO ने स्पष्ट शब्दों में कहा है कि मानसिक स्वास्थ्य अब Global Public HealthEmergency बन चुका है।यह चेतावनी बताती है कि यदि समय रहते ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो इसके सामाजिक और आर्थिक परिणाम आने वाली पीढ़ियों तक महसूस किए जाएंगे।तनाव कमजोरी नहीं, सामाजिक ढाँचे की देनवैज्ञानिक शोध (PMC) यह स्पष्ट करते हैं कि तनाव किसी व्यक्ति की नाकामी या कमजोरी नहीं है।इसके पीछे सामाजिक असमानता, बेरोज़गारी, भेदभाव और पारिवारिक व सामाजिक सहारे की कमी जैसे कारण ज़िम्मेदार हैं।विशेषज्ञ मानते हैं कि जब समाज का ढाँचा असंतुलित होता है, तो उसका सीधा असर व्यक्ति के मानसिक स्वास्थ्य पर पड़ता है।इसलिए तनाव को केवल व्यक्तिगत स्तर पर नहीं, बल्किसामाजिक समस्या के रूप में समझना और उसी स्तर पर समाधान तलाशना ज़रूरी है।
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