सीमा से सटे गांवों में सड़क नहीं, सिर्फ वादों की धूल 15 किलोमीटर की दूरी, 78 साल की देरी,

महुआडांड़ (झारखंड)देश में विकास की रफ्तार के दावे तेज हैं नई सड़कों, एक्सप्रेस-वे और शहरी परियोजनाओं की गूंज सुनाई देती है। लेकिन छत्तीसगढ़ सीमा से सटे महुआडांड़ प्रखंड की ओरसा पंचायत में 36 गढ़ सीमा से पीयार पाथ होते हुए भुगलुडीह (जामडीह का टोला) तक 15 किलोमीटर लंबा मार्ग आज भी उपेक्षा की मार झेल रहा है।आज़ादी के 78 वर्षों बाद भी यह सड़क कच्ची है। जगह-जगह गड्ढे, बारिश में कीचड़ और गर्मियों में उड़ती धूल—यही यहां की पहचान बन चुकी है। सीमावर्ती और आदिवासी बहुल इस क्षेत्र में बुनियादी सुविधा का अभाव स्थानीय लोगों के लिए रोज़मर्रा की चुनौती है।
विकास बनाम जमीनी हकीकत
सरकारी दस्तावेजों में ग्रामीण सड़कों के विकास की योजनाएं दर्ज हैं, लेकिन ग्रामीणों का कहना है कि इस मार्ग पर ठोस काम कभी शुरू नहीं हुआ। चुनावी मौसम में आश्वासन मिलते हैं, मगर नतीजे नहीं।लोग बताते हैं कि अभी तक सांसद,विधायक जनप्रतिनिधि बदलते रहे, घोषणाएं दोहराई जाती रहीं, पर 15 किलोमीटर की यह दूरी आज भी वैसी ही है। गांववालों के लिए यह सड़क अब उम्मीद से ज्यादा निराशा का प्रतीक बन चुकी है।
बरसात में बढ़ जाती है मुश्किल
मानसून के दिनों में यह रास्ता सबसे ज्यादा खतरनाक हो जाता है। वाहन फंस जाते हैं, बाइक फिसल जाती है और पैदल चलना भी जोखिम भरा हो जाता है।ग्रामीणों के अनुसार आपात स्थिति में एम्बुलेंस गांव तक नहीं पहुंच पाती। मरीजों को खाट पर लादकर मुख्य सड़क तक ले जाना पड़ता है। गर्भवती महिलाओं, बुजुर्गों और बच्चों के लिए यह रास्ता किसी परीक्षा से कम नहीं।
शिक्षा और खेती पर असर
स्कूल जाने वाले बच्चों को रोज इसी मार्ग से गुजरना पड़ता है। खराब मौसम में पढ़ाई प्रभावित होती है। किसान अपनी उपज समय पर बाजार नहीं पहुंचा पाते, जिससे आर्थिक नुकसान झेलना पड़ता है।ग्रामीणों का कहना है कि सड़क की कमी ने विकास की गति को रोक रखा है।
अब उठ रही है आवाज
गांवों में आक्रोश बढ़ रहा है। लोगों ने स्पष्ट किया है कि यदि जल्द सड़क निर्माण की प्रक्रिया शुरू नहीं हुई तो वे लोकतांत्रिक तरीके से आंदोलन करने पर विचार करेंगे।
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