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महुआडांड़ प्रखंड में सरकार के गुणवत्तापूर्ण शिक्षा के दावे खोखले, करोड़ों खर्च के बाद भी सिंगल टीचर के भरोसे बच्चों का भविष्य

महुआडांड़ प्रखंड में सरकारी शिक्षा व्यवस्था पूरी तरह सवालों के घेरे में है। दर्जनों सरकारी विद्यालय आज भी एकमात्र शिक्षक के सहारे संचालित हो रहे हैं। सरकार द्वारा बच्चों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा देने के दावे किए जा रहे हैं, लेकिन जमीनी हकीकत इन दावों को पूरी तरह खोखला साबित कर रही है। ग्रामीणों का आरोप है कि पूरे प्रखंड में एक वर्ष से अधिक समय से अधिकांश स्कूल सिंगल टीचर की गंभीर समस्या से जूझ रहे हैं, जिससे शिक्षा व्यवस्था लगभग ठप हो चुकी है।ग्रामीणों के अनुसार, विद्यालयों में पदस्थापित एकमात्र शिक्षक पढ़ाने के बजाय सरकारी कागजी कार्यों में उलझे रहते हैं। ऑनलाइन रिपोर्टिंग, विभागीय पोर्टल अपडेट, मध्यान्ह भोजन योजना, छात्रवृत्ति, विभिन्न सर्वे और अन्य प्रशासनिक कार्यों का पूरा बोझ एक ही शिक्षक पर डाल दिया गया है। ऐसे में बच्चों को नियमित पढ़ाई और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा देना व्यावहारिक रूप से संभव नहीं रह गया है।स्थिति इतनी भयावह है कि कई विद्यालयों में एक ही कक्षा कक्ष में अलग-अलग कक्षाओं के बच्चों को बैठाकर औपचारिकता निभाई जा रही है। न विषयवार शिक्षक उपलब्ध हैं और न ही बच्चों पर व्यक्तिगत ध्यान दिया जा सकता है। इसका सीधा असर बच्चों की शैक्षणिक गुणवत्ता पर साफ नजर आ रहा है।स्थानीय अभिभावकों का आरोप है कि क्लास 8 तक पहुंचने वाले बच्चे अंग्रेजी में अपने पिता का नाम तक सही तरीके से नहीं बोल पाते। प्राथमिक कक्षाओं के बच्चे बुनियादी पढ़ना-लिखना नहीं सीख पा रहे हैं, जबकि उच्च कक्षाओं के छात्र आगे की पढ़ाई और प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी के लिए पूरी तरह अयोग्य होते जा रहे हैं। ग्रामीणों का कहना है कि सरकार शिक्षा के नाम पर करोड़ों रुपये खर्च करने का दावा करती है, लेकिन जमीनी स्तर पर यह पैसा मिट्टी में मिल रहा है।ग्रामीणों ने यह भी गंभीर आरोप लगाया कि कई विद्यालयों में शिक्षक की अनुपस्थिति या अत्यधिक प्रशासनिक दबाव के कारण स्कूल समय से पहले ही बंद कर दिए जाते हैं। इससे बच्चों की उपस्थिति, अनुशासन और सीखने की निरंतरता पर गहरा असर पड़ रहा है।ग्रामीणों और स्थानीय जनप्रतिनिधियों ने शिक्षा विभाग से मांग की है कि महुआडांड़ प्रखंड के सभी सिंगल टीचर स्कूलों में तत्काल अतिरिक्त शिक्षकों की नियुक्ति की जाए। साथ ही शिक्षकों को गैर-शैक्षणिक कार्यों से पूरी तरह मुक्त कर केवल पठन-पाठन पर केंद्रित किया जाए, ताकि ग्रामीण क्षेत्र के बच्चों को भी गुणवत्तापूर्ण शिक्षा मिल सके।ग्रामीणों का साफ कहना है कि यदि समय रहते इस गंभीर समस्या पर ठोस और त्वरित कार्रवाई नहीं की गई, तो आने वाले वर्षों में महुआडांड़ प्रखंड की पूरी पीढ़ी शैक्षणिक रूप से पिछड़ जाएगी। इसकी सीधी जिम्मेदारी शिक्षा विभाग और सरकार की होगी। मौजूदा हालात न केवल शिक्षा व्यवस्था की पोल खोल रहे हैं, बल्कि जिला स्तर तक प्रशासन को झकझोरने वाले गंभीर संकेत दे रहे हैं।

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JharTimes Desk

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