
महुआडांड़, 8 जुलाई 2025
- 7 जुलाई को महुआडांड़ में मोहर्रम का जुलूस गरिमापूर्ण ढंग से निकाला गया।
- जुलूस की अगुवाई जनरल खलीफा तनवीर अहमद उर्फ़ रिंकू और नायब खलीफा शमशाद अंसारी ने की।
- समापन पर बस स्टैंड में परंपरागत लाठीबाज़ी और तलवारबाज़ी का प्रदर्शन किया गया।
- विधायक रामचंद्र सिंह, एसडीओ, थाना प्रभारी समेत कई अधिकारी और जनप्रतिनिधि मौजूद रहे।
- मोहर्रम के इतिहास और इमाम हुसैन की कुर्बानी को भी श्रद्धांजलि स्वरूप याद किया गया।
महुआडांड़ में 7 जुलाई 2025 को मोहर्रम के अवसर पर परंपरागत जुलूस का आयोजन किया गया। इस जुलूस की अगुवाई जनरल खलीफा तनवीर अहमद उर्फ़ रिंकू और नायब खलीफा शमशाद अंसारी द्वारा की गई। आयोजन में स्थानीय लोगों की बड़ी भागीदारी रही, और पूरा कार्यक्रम शांतिपूर्ण तरीके से संपन्न हुआ

जुलूस का समापन बस स्टैंड महुआडांड़ में हुआ, जहां परंपरागत लाठीबाज़ी और तलवार का खेल प्रदर्शित किया गया। इस मौके पर दर्शकों ने साहस और अनुशासन से भरे इस प्रदर्शन की सराहना की।
मोहर्रम का महत्व और इमाम हुसैन की कुर्बानी
मोहर्रम इस्लामी कैलेंडर का पहला महीना है, जो शोक, आत्मनिरीक्षण और बलिदान की याद में मनाया जाता है। खासतौर से 10वीं तारीख, जिसे आशूरा कहा जाता है, कर्बला के युद्ध की याद दिलाती है, जहां इमाम हुसैन (अलैहिस्सलाम) — पैगंबर मुहम्मद (स.अ.) के नवासे — ने अन्याय और ज़ुल्म के खिलाफ़ डटकर खड़े रहते हुए अपने परिवार और साथियों के साथ जान की कुर्बानी दी।
इस अवसर पर जुलूस के दौरान कई जगहों पर इमाम हुसैन की याद में तकरीरें की गईं, और उनकी शिक्षाओं पर चलने का संकल्प दोहराया गया।
“इमाम हुसैन ने सिखाया कि सर झुकाना नहीं, सच्चाई के लिए जान देना बेहतर है।”
प्रमुख उपस्थितिगण
कार्यक्रम में माननीय विधायक रामचंद्र सिंह मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित रहे। साथ ही अनुमंडल पदाधिकारी महुआडांड़, थाना प्रशासन, सभी पंचायतों के प्रतिनिधि एवं अन्य प्रशासनिक अधिकारी भी मौजूद थे।
इमदाद फाउंडेशन के सचिव मुजतबा राजा और सभी धर्मों के प्रतिनिधियों की उपस्थिति ने कार्यक्रम को सामाजिक सौहार्द का प्रतीक बना दिया।
आयोजन संचालन
मंच संचालन की ज़िम्मेदारी लकी अली ने निभाई, जिन्होंने पूरे कार्यक्रम को सुनियोजित और अनुशासित तरीके से संपन्न कराया।

महुआडांड़ के स्थानीय निवासियों ने कहा:
“हर साल की तरह इस बार भी मोहर्रम का जुलूस बहुत ही शांतिपूर्ण और भाईचारे के वातावरण में हुआ। इससे हमारी साझी संस्कृति और मजबूत हुई है।”
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