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लोध फॉल एंट्री शुल्क में तीन करोड़ रुपये के घोटाले का आरोप

पाँच वर्षों से आय-व्यय का हिसाब गायब, ऑडिट नहीं होने से संदेह गहराया

महुआडांड़ झारखंड के सबसे ऊँचे और चर्चित पर्यटन स्थल लोध फॉल (जलप्रपात) में पर्यटकों से वसूले गए एंट्री शुल्क को लेकर करीब तीन करोड़ रुपये के बड़े वित्तीय घोटाले का आरोप सामने आया है। आरोप है कि पिछले पाँच वर्षों में प्रवेश द्वार पर वसूली गई राशि का न तो कोई लेखा-जोखा उपलब्ध है और न ही ऑडिट कराया गया, जबकि प्रतिवर्ष 60 से 70 लाख रुपये तक की वसूली की जाती रही है।लोध फॉल के प्रवेश द्वार पर संचालित एंट्री काउंटर के माध्यम से पर्यटन सीजन में प्रतिदिन सैकड़ों पर्यटकों से शुल्क लिया जाता है। इसके बावजूद यह स्पष्ट नहीं है कि वसूली गई राशि में से कितनी रकम सरकारी खाते में जमा की गई और कितनी राशि किस मद में खर्च हुई।

जनप्रतिनिधियों को नहीं मिला लिखित जवाब

जिला परिषद सदस्य इस्तेला नगेशिया, लोध ग्राम प्रधान फ्रांसिस केरकेट्टा सहित पंचायत प्रतिनिधियों और ग्रामीणों का कहना है कि कई बार आय-व्यय का विवरण मांगा गया, लेकिन अब तक कोई लिखित जवाब नहीं दिया गया।ग्रामीणों का आरोप है कि पिछले पाँच वर्षों से ऑडिट नहीं कराया गया, जो सरकारी नियमों का सीधा उल्लंघन है।

इको विकास समिति पर वित्तीय अनियमितता के आरोप

वन विभाग द्वारा गठित इको विकास समिति पर एंट्री शुल्क से प्राप्त राशि के दुरुपयोग के गंभीर आरोप लगे हैं। नियमों के अनुसार इस राशि का उपयोग पर्यटन स्थल के विकास, स्वच्छता, सुरक्षा, पथ निर्माण और स्थानीय समुदाय के कल्याण पर किया जाना अनिवार्य है।लेकिन स्थानीय लोगों का कहना है कि न पुलिया की मरम्मत हुई, न सड़क या अन्य आधारभूत सुविधाओं का विकास, इसके बावजूद हर वर्ष लाखों रुपये की वसूली होती रही।

जिम्मेदारों के बयान

समिति सचिव सह वनपाल कुंवर गंझू ने बताया,

“इस वर्ष जनवरी से राशि बैंक खाते में जमा की जा रही है। इससे पूर्व का कोई हिसाब हमें भी उपलब्ध नहीं कराया गया है।”

वहीं महुआडांड़ रेंजर उमेश कुमार दुबे ने कहा,

“जो भी राशि वसूली गई होगी, वह टोकन के माध्यम से ली गई होगी। मामले की गंभीरता से जांच कराई जाएगी और दोषी पाए जाने पर कार्रवाई होगी।”

पूर्व व वर्तमान अध्यक्षों ने दी सफाई

पूर्व समिति अध्यक्ष सुनील नगेशिया ने दावा किया कि जमा राशि से सीढ़ी, पुलिया और शौचालय का निर्माण कराया गया था।”

वर्तमान समिति अध्यक्ष नंदकिशोर नगेशिया ने कहा,वसूली गई राशि समिति सदस्यों के वेतन और मेंटेनेंस कार्यों में खर्च की गई है।”

ऑडिट न होना गबन की आशंका को मजबूत करता है

ग्रामीणों का कहना है कि सरकारी नियमों के तहत समिति को प्रत्येक वित्तीय वर्ष के अंत में आय-व्यय विवरण और ऑडिट रिपोर्ट प्रस्तुत करना अनिवार्य है, लेकिन किसी भी वर्ष का रिकॉर्ड उपलब्ध नहीं है।
लगातार ऑडिट न होना इस पूरे मामले में बड़े पैमाने पर वित्तीय अनियमितता और संभावित गबन की आशंका को और मजबूत करता है।

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JharTimes Desk

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